गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता?
भारतीय संस्कृति में भगवान गणेशजी को “विघ्नहर्ता” और “लम्बोदर” कहा गया है। उनका गजमुख शक्ति का प्रतीक है और बड़ा उदर प्रचुरता व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। उनके वाहन के रूप में मूषक (चूहा) दिखाई देता है, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया कि गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता?
प्रतीकात्मक अर्थ
गणेशजी का उदर हमें बताता है कि जहां समृद्धि होती है, वहां संतोष भी होता है।
मूषक आमतौर पर अनाज और मिठाइयों का लालची होता है।
नाग उसका शत्रु है और अक्सर चूहों को खा जाता है।
लेकिन गणेशजी की प्रतिमा में न तो नाग मूषक को खाता है, और न ही मूषक मोदक को।
यह दृश्य हमें संतोष और अहिंसा का गहरा संदेश देता है। जहां कोई भूखा नहीं है, वहां हिंसा की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
शिव परिवार की प्रतिमा से सीख
कैलाश पर्वत पर शिवजी और उनका परिवार—पार्वती, गणेशजी और कार्तिकेय—अपने-अपने वाहन के साथ दिखते हैं।
शिवजी का वाहन नंदी बैल बाघ से नहीं डरता।
कार्तिकेय का मोर नाग का शिकार नहीं करता।
नाग मूषक को नहीं खाता।
और मूषक गणेशजी का मोदक नहीं खाता।
सभी जीव संतुष्ट और शांत दिखाई देते हैं। यही संतोष जीवन में शांति का आधार है।
भूख और हिंसा का गहरा संदेश
पौराणिक प्रतीकों का यह मेल हमें समझाता है कि –
भूख ही हिंसा का मूल कारण है।
जब पेट खाली होता है, तो जीव आक्रामक और हिंसक हो जाता है।
लेकिन जहां संतोष और समृद्धि होती है, वहां न हिंसा की ज़रूरत होती है और न डर की।
इसीलिए गणेशजी की प्रतिमा हमें बताती है कि गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता, क्योंकि वहां भूख का अंत हो चुका है और संतोष का राज है।
आधुनिक जीवन के लिए संदेश
आज की दुनिया में सिर्फ शारीरिक भूख नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भूख भी हमें हिंसक और प्रतिद्वंद्वी बना देती है।
सफलता पाने की भूख कभी खत्म नहीं होती।
शक्ति और धन की चाहत इंसान को बेचैन रखती है।
लेकिन संतोष ही असली सुख है।
गणेशजी का मूषक हमें यही सिखाता है कि जब इंसान संतोषी हो जाएगा, तो हिंसा, लालच और द्वेष खत्म हो जाएगा।
निष्कर्ष
गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता – इसका उत्तर केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है। यह प्रतीक हमें बताता है कि जहां संतोष है, वहां हिंसा और भय का कोई स्थान नहीं। यही गणेशजी का असली आशीर्वाद है – समृद्धि, संतोष और सुरक्षा।